न जाने क्या समझते हो मुझे, मग़रूर कहते हो,
मगर हूँ मुत्मईन मेरी हकीक़त को समझते हो,
ये अच्छा है मुहब्बत में मुझे माजूर कहते हो...
उर्मिला माधव...
11.5.2014..
हम तो आए थे फ़क़त इक मौसीकी के नाम पर,
आपने तन्हा किया है अपने दिल तक खींच कर,
Urmila Madhav