ये मेरे शेर और क़तआत ---
Thursday, 3 November 2022
जीना होगा
उससे बिछड़े तो यही देर तक सोचा हमने,
बस हमें बैठ कर ऑ सोच कर जीना होगा?
उर्मिला माधव
अहसास
हमने आवाज़ से पहचाना नहीं उसको कभी,
उसका अहसास ही सांसों की तरह चलता है
उर्मिला माधव
उसकी ज़ुल्फ़ों
उसकी ज़ुल्फ़ों की महक आज तक बाक़ी है यहां,
शब यहां जब भी गुज़रती है तो रुक जाती है
उर्मिला माधव
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