Monday, 28 March 2022

ज़र्राह

ज़र्राह हमको कहता रहा, टूट जाओगे,
हमको भी मगर ज़िद ही रही, टूट जाएंगे..
उर्मिला माधव

Thursday, 17 March 2022

रंग में हैं

हम अकेले ख़ास अपने रंग में हैं,
यूं बज़ाहिर आप सबके संग में हैं....
उर्मिला माधव..
4.9.2017

Saturday, 5 March 2022

हम चुकाते रह गए

मेरी सबसे पसंदीदा रचनाओं में से एक 

हम चुकाते रह गए ...सच बोलने की कीमतें,
तोड़ कर जाते रहे सब .उम्र भर की निसबतें,
यूँ भी तबियत के हमेशा हम बहुत नादिर रहे,
रास भी आईं तो कुछ तन्हाईयाँ और ख़लवतें.
उर्मिला माधव
5.3.2016