Monday, 30 October 2017

आ जाओ न

एक मतला एक शेर....

किस तरह तुमसे कहूँ आजाओ ना,
नईं समझती हूँ मुझे समझाओ ना,

बात तक मेरी  नहीं सुनते हो तुम,
अब नहीं बोलूंगी तुम से जाओ ना,
उर्मिला माधव...
31.10 2014...

वक़्त खोया

ये भी सच है मैंने तुझपे वक़्त तो खोया मगर,
था ज़रूरी ये  बहुत तुझ को समझने के लिए
उर्मिला माधव
31. 10. 2015

Sunday, 29 October 2017

मजबूर होना है

मुहब्बत में मुझे हर हाल में मजबूर होना है,
ये जब तक ह तभी तक इश्क़ में मख़मूर होना है,
अगर इस घर से जब जइयो,तो दिल को तोड़ता जइयो,
क्यूँ फिर बाकी बचें शीशे इन्हें भी चूर होना है  ।। उर्मिला माधव.....

कौन करे

दिल को दरकार जब दुआ भी नहीं,
फ़िक़्र फिर .....बद्दुआ की कौन करे...
उर्मिला माधव,

होना था मुझको

मैं वही हूँ जो नहीं होना था मुझको,
ज़िन्दगी हूँ,इक यही रोना था मुझको,

लाद के करती भी क्या बार-ए-मुहब्बत,
ज़ख़्म ही तो उम्र भर धोना था मुझको,

साथ तो देगा नहीं


मैं समंदर से,हवा से,किसलिए लड़ती फिरूँ
जब मुझे अहसास है तू साथ तो देगा नहीं...
उर्मिला माधव
30.10.2015

Saturday, 28 October 2017

तस्वीरी शेर----- jab gulon ke paas se guzre to ye dil kah uthaa, bas dur-e-dindaan kii duniyaan hataa lo ik taraf.... ---------------------------------------------------------------- जब गुलों के पास से गुज़रे तो ये दिल कह उठा, अब दुर-ए-दिन्दान की दुनियां हटालो इक तरफ़.... उर्मिला माधव... 29.10 2014...

तस्वीरी शेर-----
jab gulon ke paas se guzre to ye dil kah uthaa,
bas dur-e-dindaan kii duniyaan hataa lo ik taraf....
----------------------------------------------------------------
जब गुलों के पास से गुज़रे तो ये दिल कह उठा,
अब दुर-ए-दिन्दान की दुनियां हटालो इक तरफ़....
उर्मिला माधव...
29.10 2014...

ज़ाबिर

muhabbat kii raftaar......tham sii gaii hai,
zamaana hai jaabir kise gam bataanaa,
----------------------------------------------------
मुहब्बत की रफ़्तार थम सी गई है,
ज़माना है जाबिर,किसे गम बताना...
उर्मिला माधव...
29.10 2014..
जाबिर---- अत्याचारी

मां कह दिया उसने

Ek Ajnabee khatun ko maa kah diya usne,
Magar mazhab ne uske daayre mahdood kar daale...
#उर्मिलामाधव..
29.10.2015
::
एक अजनबी ख़ातून को ....माँ कह दिया उसने,
मगर मज़हब ने उसके दायरे महदूद कर डाले..

इंसां की ज़िंदगी भी हर ग़ाम इम्तिहां है

इंसाँ की ज़िन्दगी भी .......हर ग़ाम इम्तिहाँ है,
तौफ़ीक़ मुझको देदे .....आब-ए-हयात रखलूँ,
कैसी भी रहगुज़र हो,.....रफ्तार हो मुक़म्मल,
महफ़िल में आलिमों की अपनी बिसात रखलूँ
उर्मिला माधव
3.7.2013

ग़ाम---क़दम
तौफ़ीक़---शक्ति
आब-ए-हयात--ज़िन्दगी का पानी--यानी ---अमृत
रहगुज़र--रास्ता
मुक़म्मल--अटल
आलिम---विद्वान..

Friday, 27 October 2017

सौगात

हो कहीं भी तुम,हमारे साथ हो,
यूँ हमारी ज़ीस्त की सौगात हो,

ज़िन्दगी ये चाहती है तुमसे अब,
तुमको देखूं दिन हो चाहे रात हो,

वो तुम्हारा मुस्कुराना बज़्म में,
कौन नईं मर जाए जो ये बात हो,

एक दिन ऐसा भी आया चाहिए,
तुम रहो ऑ रात भर बरसात हो,

मावरा दिल दर्द से हो जायेगा,
हाथ में जिस दम तुम्हारा हाथ हो.....
उर्मिला माधव...
28.10.2014....

Thursday, 26 October 2017

हम्द-ओ-सना

ख़ुद ही सूरत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही आईना हूँ देख लो,
ख़ुद ही चाहत ख़ुद-ब-ख़ुद मैं आशना हूँ देख लो,

पाक़-ओ-ताहिर दिल ये मेरा ग़ैर का तालिब नहीं,
ख़ुद रुबाई खुद-ब-ख़ुद हम्द-ओ-सना हूँ देख लो,

ख़ुद-ब-खुद दीवानगी हूँ,होश भी हूँ,ख़ुद-ब-खुद
ख़ुद तग़ाफ़ुल ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं अना हूँ देख लो,
#उर्मिलामाधव..
27.10.2015

सूरत

मनाही नहीं,सूरत देखने की,
पर इसे पढ़ना भी है
दिल से नहीं
दिमाग़ से,
कितने फरेब लिखे हैं
मुश्किल है
ऐसे चेहरों की
इबारत पढ़ना
सूरत जितनी दिलकश,
उतनी उलझी हुई इबारत,
तुमने सुना भी होगा सखी?
ऑल दैट ग्लिटर्स इज़ नॉट गोल्ड
यानि हर चमकने वाली चीज़
सोना नहीं
इसलिए ख़ुद को खोना नहीं
कितने सुहाने लगते हैं
दूर के ढोल,
पर पास जाकर सुनना कभी
कान तो क्या,
दिलो दिमाग़ भी हिल जाएंगे
रोज़ पढ़ती हूँ मैं उस चमकीली सूरत को
रोज़ लड़ती हूँ अपने आप से,
उस चेहरे से रोज़ाना
मेरे दिल की दूरी
कुछ और बढ़ जाती है
फ़रेब उसका रोज़ ही
कुछ और ज़ियादा दिखाई देता है
ये खरा सच है उस सूरत के हिस्से का
जो जानना ज़रूरी है,तुम्हारे लिए,
ये जो दूरी है,अच्छी है तुम्हारे लिए
सूरत खुश है, फ़रेब रचकर,
और मैं, उस पर हंस कर
उसकी आदत में शामिल है,
मुझे कम से कम करके आंकना
उसी सूरत की बाबत है ये सब
जो अचानक ही तुम्हारे मन को
बहुत भा गई है
दूरियां सुहानी हैं
इन्हें क़ायम रहने दो
वरना ऐसी नज़दीकियां
इनका कोई मुस्तक़बिल नहीं
सिर्फ़ सूरत ही सूरत है
सीरत का नामो निशान नहीं
मन से हारना तो मैंने कभी
सीखा ही नहीं
और कहा हमेशा मजबूती से
एकला चालो रे.....
तुम भी सीख लो....
अकेले चलना...
उर्मिला माधव
27.10.2015

Wednesday, 25 October 2017

हुजूमे दुश्मनां

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां,
सामने है रायगां,

इक मुहब्बत के लिए !!
किस क़दर हैं बदगुमां,

ज़ीस्त जिसने दी मुझे,
वो ही देगा सायबां,

खुद-ब-खुद करना सभी,
कौन किसपे मेहरबां,

वक़्त देखा बदतरीन,
था सभी कुछ तो निहां....

किसलिए हो फ़िक्र तब,
ये बताओ जान-ए-जां,
उर्मिला माधव....
26.10.2014...

Monday, 23 October 2017

आह भर के

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके
संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के,

किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं,
ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के,

न जाने वो क्या था समझ में न आया,
के ये जिंदगानी मिली हमको मर के,

मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना,
हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के,

मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा -
चला भी गया दे के असबाब घर के,
उर्मिला माधव...
2.10 2014...

भोग ली दुनियां

ये दुनियां,दोगली दुनियां,
ये दुनियां खोखली दुनियां,

झुका ले सर अगर दम है,
ये दुनियां,ओखली दुनियां...

न पहचाना मगर सर पर,
ये दुनियां ठोक ली दुनियां,

मुसव्विर ने भी पछता कर,
ये दुनियां भोग ली दुनियां,

मगर कुछ ख़ास लोगों ने,
ये दुनियां सोख ली दुनियां,

ब-मुश्किल अपने हाथों पर
ये दुनियां रोक ली दुनियां,
#उर्मिलामाधव
24.10.2015

हाज़िर करूँगी मैं

जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं,
अगर कोई ठेस पहुंचेगी,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं,

कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती,
कोई आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं,

अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर,
भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं,

दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती,
फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं,

अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ,
ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं...
#उर्मिलामाधव..
24.10.2015

चुप करा दूँ

दिल ये कहता है ज़रा सा मुस्कुरा दूँ,
और तुम्हारे झूठ पे ....परदा गिरा दूँ,

क्यूँ तुम्हारी आबरू पर दाग़ हो कुछ,
उंगलियाँ होठों पे रख दूँ चुप करा दूँ....
उर्मिला माधव....
24.10.2016

Sunday, 22 October 2017

तहज़ीब

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं,
बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए हैं

सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको,
जवां क्या हुए,........बे-वफ़ा हो गए हैं,

वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना,
किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं,
उर्मिला माधव...
23.10.2014

तक़लीफ़

तक़लीफ़ हुई थी,
जब तुम पहली बार रूड बोले थे,
ताज्जुब हुआ था,
जब प्रतिउत्तर में तुम झूठ बोले थे,
तुम ये समझे,मैंने मान लिया था,
पर नहीं समझे तो बस इतना,
कि मैंने सब कुछ जान लिया था ,
परदे के पीछे का सच,
वो आधार हीन खीझ,
जो तुमने मुझ पर उतारी थी,
तुम ये भूल गए थे,
मैंने तो ये ज़िन्दगी पहले भी,
कई बार हारी थी,
सदमे नहीं लगते अब,
किसी भी सूरत में,
क्यूंकि,
मिलने से पहले मैं स्वयं ही बिछुड़ जाती हूँ,
फिर उसी गली को मुड़ जाती हूँ,
और अपने अतीत से जुड़ जाती हूँ,
कभी-कभी सोचती हूँ,
तुम्हारे कहे शब्द,
मैं हमेशा,साथ नहीं हो सकता,
और तुम साथ नहीं हुए,
तो क्या मैं चली नहीं?
ये क्रम है,मेरे जीवन का,
हार-जीत से परे,
कोई फ़र्क नहीं,
किसी उपेक्षा से,
तुम तो पहले भी नहीं थे,
तुमसे मिलने को,
क्या अकेली नहीं आई थी?
अकेले सफ़र की शुरुआत,
नहीं की थी ?
अरे..!!
जो हार से ही शुरू हुआ हो,
उसे क्या अंतर होगा ?
अब हार पहना दो,
या हार मनवा लो,
एक ही तो बात हुई न,
उर्मिला माधव...
23.10.2016