Monday, 23 October 2017

आह भर के

कभी कुछ बिखर के,कभी आह भरके
संभाला है ये दिल मुसलसल सिहर के,

किसे क्या बताते अजब मुश्किलें थीं,
ख़तरनाक दुनिया में गुजरी है डर के,

न जाने वो क्या था समझ में न आया,
के ये जिंदगानी मिली हमको मर के,

मुक़द्दर था यकता ज़माने में अपना,
हरे ज़ख्म लेकर फिरे दर-ब-दर के,

मेरे आँसुओं से जो दामन था भीगा -
चला भी गया दे के असबाब घर के,
उर्मिला माधव...
2.10 2014...

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