इक हुजूमे-ए-दुश्मनां,
सामने है रायगां,
इक मुहब्बत के लिए !!
किस क़दर हैं बदगुमां,
ज़ीस्त जिसने दी मुझे,
वो ही देगा सायबां,
खुद-ब-खुद करना सभी,
कौन किसपे मेहरबां,
वक़्त देखा बदतरीन,
था सभी कुछ तो निहां....
किसलिए हो फ़िक्र तब,
ये बताओ जान-ए-जां,
उर्मिला माधव....
26.10.2014...
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