जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं,
अगर कोई ठेस पहुंचेगी,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं,
कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती,
कोई आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं,
अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर,
भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं,
दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती,
फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं,
अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ,
ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं...
#उर्मिलामाधव..
24.10.2015
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