Wednesday, 18 March 2026

ख़्वाब बुनते हैं

बेवजह कितने ख़्वाब बुनते हैं,
अपनी मर्ज़ी से अश्क़ चुनते हैं,
ख़ुद की हस्ती को भूल जाते हैं,
सिर्फ़ ग़ैरों की बात सुनते हैं।। .
उर्मिला माधव.
19.3.2013

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