Wednesday, 15 August 2018

कितने न जाने

निशान-ए-नज़्र में शामिल रहे हैं ज़ाविये कितने न जाने,
और आख़िर हश्र में हासिल रहेंगे हाशिये कितने न जाने,
उर्मिला माधव,
16.8.2016

No comments:

Post a Comment