Sunday, 7 July 2019

पुरवाईयां

गिरहबंद क़ता...

ज़िन्दगी समझी नहीं कुछ ..वक़्त की गहराइयाँ,
और हम गिनते रहे,.....अपनी फ़क़त तन्हाईयाँ,
क़त्ल हमकोे कर दिया,मुतलक़ बिना तलवार के
ज़ह्र सी लगती रहीं यूँ........शह्र की पुरवाइयां..
उर्मिला माधव..
8.7.2015

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