Monday, 29 July 2019

जो अशआर अलका मिश्रा को दिए

ग़र समझना चाहते हो तुम कभी मेरा वजूद,
उम्र भर को माँग की सुर्ख़ी मिटा कर देखना...

एक से बढ़कर एक तीरंदाज़ थे,
मक़बरे सारे उलट कर देख ले..

सर तो हो लेकिन नहीं हो सर परस्त,
उस घड़ी तुम ज़िन्दगी को आज़माना..

इस क़दर रोते हुए वो फिर रहा था दर-ब-दर,
पाक़-ओ-ताहिर रूह वाले लोग बाहर आ गए...

क्यूँ कोई क़िस्सा करे,ग़म के मुतल्लिक जा-ब-जा ,
ज़ेहन-ओ-दिल इनसान के अब बर्फ़ के घर हो गए,

हाथ से चेहरे को ढक कर उसने देखा आइना,
फिर भी ग़म्माज़ी तो उंगली के झरोखे कर गए,

मिल ही जाते हैं दुनियां में,कभी कहीं कुछ प्यारे लोग,
ख़्वाबों की बुनियाद के अब भी, होते हैं रखवारे लोग,

जिस पे ज़ाहिर हैं ,ख़राबात तिरी दुनिया के,
उसको अब हश्र में जाने की ज़रूरत क्या है...

मेरी वफ़ा की शक़्ल ....बिगाड़ी है दह्र ने,
वरना मिरे मिजाज़ में तल्ख़ी कभी न थी...

यहाँ ख़ालिस मुलम्मेदार हैं,आक़ाओं के चेहरे,
हिफाज़त इक बहाना है,असल ये नाक़ाबन्दी है,
उर्मिला माधव
30.7.2016

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