ग़ैर की महफ़िल की जानिब तेरा चश्म-ए- ग़ौर है,
ख़ुद ही शर्मिन्दा हैं खुद से,ग़ैर से शिक़वा ही क्या,
वो जो तेरी रह गुज़र थी उसका रुख़ कुछ और है .....उर्मिला माधव
1.3.2013
हम तो आए थे फ़क़त इक मौसीकी के नाम पर,
आपने तन्हा किया है अपने दिल तक खींच कर,
Urmila Madhav