ये मेरे शेर और क़तआत ---
Wednesday, 18 March 2020
डरते ही बने
ज़ीस्त की बुनियाद ऐसी है कि मरते ही बने,
जितना ही इसको समेटो ये बिखरते ही बने,
अनगिनत रानाइयाँ हैं किसको देखेंगे भला,
सूरत-ए-हालात ये कि ...सिर्फ़ डरते ही बने...
उर्मिला माधव..
11.3.2017
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