ठोकरें खाते गए, और फिर खड़े होते गए, अगली नस्लों के लिए,दार-ओ-रसन बोते गए, चोट भूले भी नहीं, और चोट फिर से लग गई, ख़ाब राहत का लिए, चैन-ओ-अमन खोते गए, उर्मिला माधव 27.8.2019
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