मेरी फरेबी ज़ीस्त का उन्वान था सराब बाहर से ज़िल्द देख कर,मिलते रहे जवाब,
हमने अज़ीम-ओ-शान से जी ज़िन्दगी ज़रूर, उम्मीद फिर भी सबको रही,बोलें जी जनाब, उर्मिला माधव .. 24.6.2017
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