Friday, 5 January 2018

क़ता

अगर पाबंदियां रोकें तो फिर ख़्वाबों में आजाना,
मेरी ग़मगीन रातों की...सियाही में,समा जाना,
किसी भी शक्ल में आना..मगर आना ज़रूरी है,
ज़रासा मैं कहूँगी कुछ,बहुत सा तुम सुना जाना....
उर्मिला माधव...
6.1.2014..

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