दो किनारे हैं नदी के,
एक मैं हूँ एक हो तुम ,
ये बताओ किस तरह मिल पायेंगे,
जब नदी जितनी उफन कर आएगी,
दूर बिलकुल दूर होते जायेंगे,
जब कभी तेज़ी बढ़ेगी धार की,
तब कहाँ उम्मीद होगी पार की,
बे-करारी,उलझनें,चलती रही हैं,
उम्र भर ये हाथ ही मलती रही हैं,
चाह तो मेरी बहुत मजबूत है पर,
क्या करूँ है नाव काग़ज़ की मगर,
दूरियां अपना मुक़द्दर हैं सुनो,
मैं खड़ी,इस पार हूँ,उस पार हो तुम...
मैं खड़ी इस पार हूँ,उस पार हो तुम...
Upadhyay Urmila...
उर्मिला माधव...
28.1.2014...
No comments:
Post a Comment