सब परिधियाँ अर्थ अपने खो चुकी हैं सृष्टि में, अब रहा संसार .......सो है शून्य मेरी दृष्टि में, कौन गणनाएँ करे आघात ऑर प्रतिघात की, चेष्टाएँ सब उपेक्षित .....पीर की अतिवृष्टि में, उर्मिला माधव... 15.11.2016
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