ये मेरे शेर और क़तआत ---
Tuesday, 4 September 2018
क्या मानी
अहले चमन रोज़ तरसते थे एक कतरे को,
वक़्त गुज़रे पे बरसने के भला क्या मानी ??
उर्मिला माधव..
५.९.२०१३
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