रेत के रास्ते हैं
रह-रह के बिखर जाते हैं,
फिर भी चलना तो पड़ेगा,
कोई उद्देश्य लेकर क्या चलूँ मैं,
ये बताओ क्या करूँ चलना छोड़ दूँ?
अनवरत है यत्न मेरा दूर जाने के लिए
मेरी रातें थक गईं है,याद करके
चैन अब मिलता नहीं कोई बात करके
आत्म केंद्रित होकर जीना ठीक होगा
मैं किसी पीड़ा को सहलूं
मुझमें वो ताक़त नहीं
जो समय ने पीर दी है
बाँध के छज्जे पै रख दी,
तुम ज़रूरत थे मेरी,पर मुझे चलना पड़ा है
साथ ख़ुद के
क्या तुम्हें लगता है
ये परस्पर दूरियां मिट पाएंगी अब?
शायद मेरी तरफ से तो नही
अब ज़रूरत थी निरंतर साथ की
कौन समझाता तुम्हें
जो तुम्हें करना नहीं था
कर रहे हो
जाओ तुम आज़ाद हो
बस यहीं तक रास्ते मिलते थे अपने,
मुझको लौटाना तुम्हारा काम था,
क्या कहूँ पर
ये समझने में मुझे सदियाँ लगी हैं
तुम ज़माने के लिए हो,लौट जाओ..
सबके पाने के लिए हो लौट जाओ
दिल दुखाने के लिए हो लौट जाओ
हाँ मैं कहती हूँ तुम्हें तुम लौट जाओ
यूँ भी तो अब मैं नहीं आउंगी तुम तक
लौट जाओ लौट जाओ लौट जाओ...
#उर्मिलामाधव
10.9.2015
Tuesday, 10 September 2019
रेत के रास्ते
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