जिसको चस्का हो शराब-ए-वस्ल का, वो मज़ा क्या पाएगा दरअस्ल का, कितनी शिद्दत है किसीकी चाह में इम्तिहाँ हो आदमी की नस्ल का ।। उर्मिला माधव...... 3.2.2016
No comments:
Post a Comment