ज़ीस्त की बुनियाद ऐसी है कि मरते ही बने, जितना ही इसको समेटो ये बिखरते ही बने, अनगिनत रानाइयाँ हैं किसको देखेंगे भला, सूरत-ए-हालात ये कि ...सिर्फ़ डरते ही बने.. उर्मिला माधव.. 11.3.2013 ranaiyan-----khoobsoorati..
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