इज़हार-ए-मुहब्बत क्या कहिये,
...........आँखों में इशारे होते हैं,
.....उल्फ़त के समंदर के घर में,
............पैदा ये सिपारे होते हैं,
सूली पै चढ़ा मंसूर......तो क्या,
जा देखिये..कूचा-ए-आशिक में,
हर वक़्त........जनाज़े उठने के,
हर सम्त..........नज़ारे होते हैं
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