कैसी झीनी चुनरिया..उढ़ाई सखी, तैने सबरी नगरिया...हंसाई सखी, रंग डारौ सबन्ने जो मिलि कें मोहे, खूब भीतर ही भीतर लजाई सखी.... उर्मिला माधव... 7.3.2014...
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