रोज़ लिखते हैं और मिटाते हैं, क्यूँ....कलम लेके बैठ जाते हैं?? पूरी शिद्दत से.....यूँ निभाते हैं, रोटियाँ जैसे....इसकी खाते हैं.... उर्मिला माधव... 28.3.2014...
No comments:
Post a Comment