ज़ब्त करते हैं ........लहू रिसने तक, और झुकते हैं ......जबीं घिसने तक, हमने जब दैर-ओ-हरम समझी ज़मीं, आह भरते हैं ......बहुत पिसने तक .... #उर्मिलामाधव... 19.5.2015
No comments:
Post a Comment