दिन उजालों तक ठहर पाया नहीं, रात तो फिर रात थी ...गहरा गई,
माज़रा तो सब समझ आता रहा, आदतन ही ज़िन्दगी ग़म खा गई, उर्मिला माधव 17.5.2017
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