Wednesday, 16 May 2018

ग़म खा गई

दिन  उजालों तक ठहर पाया नहीं,
रात तो फिर रात थी ...गहरा गई,

माज़रा तो सब समझ आता रहा,
आदतन ही ज़िन्दगी ग़म खा गई,
उर्मिला माधव
17.5.2017

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