मैंने ख़ुद को संभाल रख्खा है, दर्द ....कांधे पे डाल रख्खा है,
ग़म सभी ज़िन्दगी में पिनहां हैं, क्या कहीं अर्ज़-ए-हाल रख्खा है? उर्मिला माधव,
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