Friday, 8 February 2019

बस गया

कौन जाने कब कहाँ से आके दिल में बस गया,
मेरे दिल की बेबसी पर खोल कर दिल हँस गया,
ऐसे महर-ए-ख़्वाब को हम देर तक सोचा किये,
ख़्वाब था या ज़हर था जो ज़िन्दगी को डस गया?
उर्मिला माधव..
9.2.2013

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