कौन जाने कब कहाँ से आके दिल में बस गया, मेरे दिल की बेबसी पर खोल कर दिल हँस गया, ऐसे महर-ए-ख़्वाब को हम देर तक सोचा किये, ख़्वाब था या ज़हर था जो ज़िन्दगी को डस गया? उर्मिला माधव.. 9.2.2013
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