Thursday, 30 November 2017

क़ता

किसी भी आस्ताने पर...जबीं झुकती नहीं मेरी,
जो ग़र कहने पे आ जाऊं ज़ुबां,रूकतीं नहीं मेरी,
न जाने क्या समझते हैं जिगर पर चोट करते हैं,
मैं क्या बेजान पत्थर हूँ,कि रग दुखती नहीं मेरी??
उर्मिला माधव...
1.12.2013

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