पुराने पन्नों से--- दिल तो ख़ुद के ही ग़म से परेशान है, कैसे दुनियाँ के ग़म से मुख़ातिब रहे?? फ़ैसले मेरे हक़ में...सुनाता ही कौन?? मेरे दुश्मन ही सब..मेरे क़ातिब रहे। उर्मिला माधव... २५.११.२०१३..
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