जोश-ए-उल्फ़त में सू-ए-दिलबर चली जाती हूँ मैं, कौन हूँ,क्या चाहती हूँ........कब ये बतलाती हूँ मैं, बे-तवज्जो सा रवैय्या............बाखुदा महबूब का, तोड़ते जाते हैं वो............और जोड़ती जाती हूँ मैं..... उर्मिला माधव... 16.11.2014...
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