पत्थरों के शहर में ........कहाँ आगए, हम फ़रेब-ए-ज़माने से ......घबरा गए, कोई दिल से मिले,....ये हुआ ही नहीं, सब ....ज़बानी जमा-ख़र्च समझा गए।।.. उर्मिला माधव.... 28.6.2015
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