हम भी .हर इक सितम समझते हैं, दह्र के ....पेच-ओ-ख़म समझते हैं, ज़ुल्म कितना भी हो मगर फिर भी, ख़ैरियत है कि …...हम समझते हैं.. उर्मिला माधव, 23.6.2017
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