ये दुनियां इतनी फ़रेबी क्यूं है ?
ज़िंदगी भी फ़ानी है,सब जानते हैं
तब झूठ मक्कारी,धोखेबाज़ी
इससे काम क्यों लिया जाता है
मेरे चार मिसरे
ऐसे ही हालातों में कहे गए...
थक के रो जाते हैं ...किरदार निभाने वाले,
इस क़दर ........दाग़ लगाते हैं ज़माने वाले,
करना पड़ता है कभी ज़ब्त सरे महफ़िल भी,
सारे अफ़साने ........नहीं होते,सुनाने वाले...
उर्मिला माधव,
No comments:
Post a Comment