चेहरे पै खिंच गईं हैं,इतिहास की लकीरें,
कब तब छुपी रहेंगी, एहसास की लकीरें,
ज़ाहिर नहीं था करना,ये फिर भी हो गया है,
आँखों से हैं नुमायाँ,कुछ प्यास की लकीरें...
साँसों का आना-जाना,मुश्किल हुआ यक़ीनन,
हर दम बिखर रही हैं,अब आस की लकीरें..
#उर्मिलामाधव...
14.7.2015
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