जब इन्क़लाब ही नहीं तो ज़िन्दाबाद क्या ? हासिल न हों नतीजे तो फ़िर ज़िहाद क्या? रस्ता ही भूल बैठे ज़ाहिद हो या बिरहमन, मंज़िल तो एक ही है तो फ़िर फ़साद क्या ? उर्मिला माधव.. 16.7.2017
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