Sunday, 15 July 2018

ज़िंदाबाद क्या ?

जब इन्क़लाब ही नहीं तो ज़िन्दाबाद क्या ?
हासिल न हों नतीजे तो फ़िर ज़िहाद क्या?
रस्ता ही भूल बैठे ज़ाहिद हो या बिरहमन,
मंज़िल तो एक ही है तो फ़िर फ़साद क्या ?
उर्मिला माधव..
16.7.2017

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