ये मेरे शेर और क़तआत ---
Thursday, 23 January 2020
मुस्कुराते हैं
गहरे ज़ख़्मों पे चोट खाते हैं,
अहले दिल यूँ ही मुसकुराते हैं,
ग़ुज़रे शामो सहर किसी तरहा,
रात होते ही टूट जाते हैं,
दर्दे क़ुरबत से रू-ब-रू होकर,
चश्मे ग़िरियाँ में डूब जाते हैं
उर्मिला माधव..
24.1.2013
२४.१.२०१३
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