एक हंसी,अबोध सी,
हिला देती है,अंतर्मन को,
पथ्थरों की श्रृंखलाएं,
मार्ग कंटक पूर्ण हैं सब,
सूर्य की कुछ रश्मियां हैं
और निहित है आग इनमें,
सामना करना न जाने,
कौन समझायेगा उसको,
वो जो है निश्छल कली सी,
मुक्त होना चाहती है,
चाहती उड़ना,गगन में,
मैं सहम कर देखती हूँ,
याचना ईश्वर से करके,
उसकी खुशियां मांगती हूँ...
उर्मिला माधव
8.1.2017
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