2014 में लिखी एक ग़ज़ल---
ये तो ज़ाहिर है,वो बिलकुल बे-वफ़ा है,
हाँ मगर दिल का अलहदा फ़लसफ़ा है,
क्यूँ किसी इन्सान का शिकवा करूँ मैं,
गम मेरी तक़दीर का अव्वल सफ्हा है,
बारहा तन्हाइयां हैं,बारहा वीरां सफ़र भी,
क्या समझते हो महज पहली दफा है??
रंजिशें जमकर निभायीं वक़्त ने भी,
ज़िन्दगी में हर कोई मुझसे खफा है,
वक़्त की...महबूब की,तक़दीर की या,
आप सब बतलाइये किसकी ज़फा है??
उर्मिला माधव...
27.1.2014..
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