मैं ........सियह रात की गवाही हूँ, ख़ुद बख़ुद उसकी आवा-जाही हूँ, कुछ परिंदों के ....पंख बिखरे हुए, ज़ेह्न-ए-गुलज़ार की .....तबाही हूँ उर्मिला माधव.. 23.1.2017
No comments:
Post a Comment