कल्पनाएँ तो ह्रदय की होगयीं ऊंची गगन सी, वास्तविकता के सहज सोपान होते ही कहाँ हैं?? मंदिरों में देवता पर......पुष्प चढ़ते हैं सहस्त्रों, किन्तु सब निष्प्राण है,वरदान होते ही कहाँ हैं?? उर्मिला माधव... १८.१.२०१४...
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