कितने सारे। ...दर्द समेटे फिरता है, दिल में आहें। ..सर्द समेटे फिरता है, जब चाहे तब दुनियां अपनी रच डाले बेमतलब की। ..गर्द समेटे फिरता है उर्मिला माधव
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