चराग़ बुझने लगे,नींद अब कहाँ है बता, न जाने कब से मेरी आँख दे रही है सदा,
कहाँ सुकून,कहाँ ज़ब्त औऱ ये ख़ामोशी, हयात कब से मुझे यूँ ही दे रही है सज़ा,
क़यास-ए-कल्ब मेरा और अदा ज़माने की, ये तीरगी भी फ़क़त ग़म को दे रही है हवा,
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