ये मेरे शेर और क़तआत ---
Thursday, 23 October 2025
चोट खाते हैं
गहरे ज़ख़्मों पे...चोट खाते हैं,
अहले दिल यूँ ही मुसकुराते हैं,
ग़ुज़रे शामो सहर किसी तरहा,
रात होते ही.........टूट जाते हैं,
दर्दे क़ुरबत से...रू-ब-रू होकर,
चश्मे ग़िरियाँ में...डूब जाते हैं...
उर्मिला माधव..
२४.१.२०१३
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