Tuesday, 14 October 2025

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं

गीता वर्मा
आदरणीया Urmila दीदी की एक ग़ज़ल....
इतनी प्यारी लगी कि शेयर किये बिना न रह सकी....

फ़क़त रेशम सी गांठें थीं...ज़रा सी खोल ली जातीं,
जो बातें दिल को चुभती थीं,जुबां से बोल लीं जातीं,

अगरचे खौफ़ इतना था...कोई दिल पर न लेजाये,
कहीं कहने से पहले एहतियातन...तोल ली जातीं,

मुहब्बत को सलीके से....निभाना ही नहीं था तब,
ज़रुरत क्या थी ऐसी मुश्किलें खुद मोल ली जातीं,

फरेब-ओ-मक्र में,फंसना,फंसाना शौक था जिनका,
दरीचे झाँकने को तब.........ज़मीनें गोल ली जातीं,

......उर्मिला माधव जी

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