पहाड़ों की साँसों की.......रफ़्तार कहना,
तो बतलायेंगे हम......नदी का भी बहना,
ये सूरज निकलना......हवाओं का चलना,
दरख्तों पे शाखों का.......लहरा के हिलना,
ये झरनों के पानी का........नीचे फिसलना,
कि नदिया के पानी में हिल-मिलके चलना,
यकायक पहाड़ों का............लावा उगलना,
काली घटाओं का...............ऐसा मचलना,
यूँ छन-छनके.......अब्र-ए-बहारां निकलना,
बहुत खूब नदिया का.......चलना-उछलना,
कभी कुछ बिगड़ना......कभी कुछ संभलना,
हर इक रंग में है .............रफ़्तार मिलना......
उर्मिला माधव...
२३.९.२०१३
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