तीर ऑ तलवार हो कर रह गए,
बे-वज्ह हथियार हो कर रह गए,
प्यार से दामन भरा हर शख़्स का,
और अदू हर बार हो कर रह गए,
जिसका जी चाहा वो कुछ भी कह गया,
इस क़दर बाज़ार होकर रह गए,
झूठ और सच का कहाँ हो फैसला,
धारे भी जब धार हो कर रह गए,
हम मुहब्बत से गले मिलते थे पर,
लोग ही हुशियार हो कर रह गए,
चंद खुशियां ढूंढते फिरते थे हम,
ग़म गले का हार हो कर रह गए..
उर्मिला माधव,
14.11.2017
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