ये मेरे शेर और क़तआत ---
Friday, 16 August 2024
बदहवास को
जो क़ाफ़िए और बह्र को रोते हैं रात दिन,
वो जानते कहाँ हैं, किसी बदहवास को,
जीते हैं अपने तौर पे, हम अब भी आज भी,
हम जानते कहाँ हैं, किसी ग़मशनास को...
उर्मिला माधव
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