देख जाने वाले तुझको सोचना क्या
ज़िन्दगी है, जाने क्या-क्या छूटता है,
जिस्म-ओ-जां से राब्ता भी टूटता है,
अपनी मुट्ठी में मुक़द्दर बांधता है,
कुछ नहीं रुकता है, ये भी जानता है,
रोज़ रोता और बिलखता ज़िन्दगी पर,
कुछ नहीं रुकता है, ये भी जानता है
चाहे जितनी हों तिरी मजबूरियां,
जिस से रहनी हैं, रहेंगी, दूरियां,
कुछ नहीं रुकता है तू भी जानता है
उर्मिला माधव